पैरोँ की अंगुलियोँ से गढ़ रहे हैँ अपना भविष्य


                                                             

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Dear friends यह एक सच्ची कहानी है उस लड़के की जो अभी करीब मेरे ही उम्र का है लेकिन फर्क सिर्फ इतना है कि वे अपना भविष्य अपनेँ पैरोँ की अंगुलियोँ से गढ़ रहे हैँ।
दोस्तोँ अपनेँ हाथोँ से अपनेँ भविष्य को गढ़ना और अपनेँ भाग्य को सँवारना बहूत आसान है लेकिन राजेश जी अपना भविष्य अपनेँ पैरोँ से गढ़ रहे हैँ।

राजेश का जन्म कोरबा छत्तीसगढ़ के पोड़ी विकासखंड के एक गाँव खम्हारमुड़ा मेँ हूआ था। राजेश के परिवार को उसके जन्म की खुशी तो बहूत थी लेकिन उन्हेँ इस बात का दुख भी था कि राजेश के जन्म से ही दोनोँ हाथ नहीँ थे और इस बात का ही उन्हे बहूत गम था।
घर के सभी सदस्य और गाँव वाले भी उसके हाथ को लेकर काफी परेशान थे। सबको यही चिँता खाये जा रही थी कि राजेश का Future कैसा होगा। जैसे-जैसे वक्त बीतते गये परेशानी और चिँतायेँ बढ़ती गयीँ. समय के साथ-साथ राजेश नेँ भी इसे नियति मान लिया और उसनेँ, उसके साथ किये गये कुदरत के इस अन्याय के साथ युध्द करनेँ की शुरूआत की।
अपनेँ विकलांगता को राजेश नेँ कभी भी अपनी कमजोरी नहीँ बननेँ दिया। बगैर हाथोँ के लिखना संभव नहीँ होता लेकिन राजेश  लिखना चाहते थे तो उन्होँनेँ अपनेँ पैरोँ से ही कलम (Pen) पकड़नेँ की ठान ली। Regular Practice से उन्होँने इसमेँ निपुणता हासिल कर ली। अब वे कागज पर सरपट अपनी कलम को दौड़ा सकते हैँ। ग्रामीण क्षेत्र मेँ जन्मेँ राजेश के पैरोँ की रफ्तार इतनी तेज है कि उन्हेँ अब हाथोँ की कमी मेहसुस नहीँ होती।
राजेश के मन मेँ सामान्य बच्चोँ की तरह साईकिल चलानेँ की हसरत भी कुलबुलाती थी, तो राजेश नेँ किसी तरह प्रैक्टिस करके अपनेँ कंधोँ से हैण्डल संभालकर साईकिल चलाना भी सीख लिया। राजेश की बढ़ती उम्र के साथ उनकी मनोबल और इच्छाशक्ति मेँ बढ़ोत्तरी हूई. राजेश नेँ गांव के ही प्राथमिक शाला मेँ शिक्षा ग्रहण किया बगैर हाथोँ के भी पैरोँ से लिखते देख लोग अचंभित होते थे.
राजेश नेँ Science के अद्भुत तकनीक मोबाईल और कम्प्युटर भी अपनेँ पैरोँ की उंगलियोँ से ही चलाना सीख लिया. अपनी कमजोरियोँ से हारनेँ के बजाये वह अपनेँ कर्मोँ मेँ विश्वास जताते रहे।
राजेश  स्वयं उत्साह से बताते हैँ कि अपनेँ लिये पहले मैनेँ बारहवीँ तक की शिक्षा अर्जित करनेँ का निश्चय किया जिसे हासिल भी कर लिया। इस बीच राज्य स्तरीय तैराकी प्रतियोगिता मेँ अपनेँ वर्ग मेँ  प्रथम स्थान प्राप्त किया, खाली समय मेँ कुछ पढ़ता हूँ, कम्प्यूटर, साईकिल हो या फिर मोबाईल सभी उपकरणोँ को मैँ पैरोँ से ही आपरेट करता हूँ। अन्य लोगोँ को देखकर एहसास जरूर होता है कि काश मेरे भी हाथ सलामत होते तो मैँ भी आज हाथ से परीक्षा लिखता, लेकिन जिस बात पर मेरा कोई जोर नहीँ उसके बारे मेँ अब सोँचकर क्या फायदा, जो है उसमेँ ही अपना सर्वश्रेष्ठ देनेँ का प्रयास करता हूँ। स्नातक तक की शिक्षा पुरी करनेँ के बाद शिक्षक बनकर बच्चोँ को पढ़ाना ही मेरा अगला लक्ष्य है। इतना कहकर एक मुस्कुराहट के साथ सहजता से राजेश नेँ कहा कि अब मुझे चलना चाहिये भाई मेरा इंतजार कर रहा होगा.**
राजेश की शारीरिक अवस्था को ध्यान मेँ रखकर College कमिटि नेँ उसे अपनेँ लिये एक राईटर दिये जानेँ की पेशकस भी की, लेकिन यहाँ भी अपनेँ जीवट व्यक्तित्व का परिचय देते हूये राजेश नेँ इस पेशकस को ठुकराकर अपनेँ पैरोँ से ही अपना भाग्य लिखना पसंद किया.
अभी राजेश जी की उम्र सिर्फ 19 वर्ष हो रही है और वे इस वर्ष बी.ए. First year का Exam दिला रहे थे।
जीवन की कठिनाईयोँ से निराश होकर पथ भटकने वाले युवाओँ के लिये राजेश एक मिसाल हैँ। एक ओर सब कुछ  होते हूये भी कुछ नहीँ कर पानेँ का अपराधबोध अपने मन मेँ लिये चल रहे लोग हैँ तो दूसरी ओर राजेश जिसके पास खोनेँ के लिये भले ही कुछ ना हो लेकिन अपनेँ लगन और अपनी द्रिढ़ इच्छा शक्ति के दम पर सब कुछ पानेँ की चाहत रखते हैँ।
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दोस्तोँ आप चाहे कैसी भी और कितनी भी बुरी परिस्थिति से ही क्योँ न जुझ रहे होँ लेकिन यदि आपके अंदर आग है कुछ कर दिखानेँ की,   लगन  है अपनेँ मंजिलोँ को पानेँ की और आत्मविश्वास के साथ एक जुनुन है अपनेँ सपनोँ को साकार करनेँ की तो यकीनन आप हर बड़े से बड़े तुफान का हँसकर सामना कर सकते है बशर्ते आप हार न मानेँ और डटेँ रहेँ जब तक कि आपको अपनीँ मंजिल ना मिल जाये।
राजेश जी एक सच्चे मिसाल हैँ इस बात का।
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"हमारी सफलता" राजेश जी के उज्जवल भविष्य की कामना करती है और यही दुआ करती है कि वे ऐसे ही आगे बढ़ते रहेँ और अपनेँ असली मुकाम तक पहूँचेँ। साथ ही अपनेँ परिवार, राज्य और अपनेँ देश का नाम रौशन करेँ।
धन्यवाद!

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