अथक परिश्रम का जीवंत उदाहरण- बुकर टी. वाशिंगटन

बुकर टी. वाशिंगटन दासता, निर्धनता और गरीबी के माहौल में पैदा हुए थे. अमरीका के गोरे लोग नीग्रो लोगों की हँसी उड़ाया करते थे..और उन्हें घृणा की नज़रों से देखते थे.. ऐसे ही निराशजनक वातावरण में वे बड़े हुए थे. उन्हें शिक्षा प्राप्ति की कोई आशा नहीं थी. लेकिन श्वेत लोगों के बच्चों को स्कूल जाते देख वाशिंगटन के मन में भी पढ़ने की तीव्र इच्छा जागी.. आरम्भ में उसे किसी शिक्षक से कोई सहायता नहीं मिली... अपनी माता द्वारा दी गयी पुस्तक से उन्होंने स्वयं ही वर्णमाला सीखी.. कुछ ही महीनों में वह उस पूरी पुस्तक से परिचित हो गए... और आख़िरकार तीव्र इच्छा ने उन्हें कीर्ति के शिखर तक पहुंचा ही दिया. उनके बहुमुखी ज्ञान की कहानी वास्तव में उत्साह तथा प्रेरणा जगाती है.. यह एक ऐसे महापुरूष की कहानी है, जिसने गरीबी तथा रंगभेद के कारण कष्ट उठाया, जिसने असाधारण धैर्य तथा असहिष्णुता के साथ अनेक दुःख-कष्ट सहे और कठोर कमरतोड़ मेहनत के बल पर जीवन में उन्नति की.. उनकी महानता-प्राप्ति के उदाहरण से सभी विकासशील व्यक्ति तथा राष्ट्र अपने उत्थान के लिए प्रेरणा ग्रहण कर सकते हैं.. कोई दुर्लभ सम्मान न मिलने पर वे अपना संतुलन खो बैठते थे.. वे निस्वार्थ सेवा के शिखर तक पहुँचे और अपने नीग्रो भाइयों की मुक्ति के लिए दिन-रात कार्य में लगे रहे.. इस महान नेता के विचार तथा कार्य सारे विश्व के लिए आदर्श हैं. समाज-कल्याण के विषय में सोचने वाला प्रत्येक व्यक्ति, सभी मानवीय गुणों के भंडार-रूप वाशिंगटन के जीवन का अध्ययन करके रोमांचित होगा... उनका जीवन ऐसे अनेक उदाहरण प्रस्तुत करता है, जिनसे पता चलता है कैसे लगन, धैर्य, स्वचेष्टा तथा आध्यात्मिक शक्ति के द्वारा मनुष्य अत्यंत शक्तिशाली बाधाओं का भी सामना कर सकता है..
उनका कहना है, 
“मैंने सीखा है कि सफलता जीवन में प्राप्त पदवी से नहीं, बल्कि उन बाधाओं से नापी जाती है जिन्हें पार करके एक व्यक्ति सफल हुआ है..”
वे लोग ही सर्वाधिक सुखी हैं, जो दूसरों के लिए अधिक प्रयास करते हैं, जो लोग दूसरों की जरा भी सहायता नहीं करते, वे ही सबसे ज्यादा दुखी हैं..
वाशिंगटन ने अपने कष्टों की बात भूलकर और अपने आय की चिंता छोड़कर अपनी जाति के लोगों को शिक्षित करने के लिए दिन-रात चेष्टा की.. उन्होंने स्कूल खोले और बच्चों को पढ़ाया... वे अलग से ट्यूशन भी पढ़ाते थे.. फिर उन्होंने तुसेनी नामक स्थान पर एक शिक्षालय बनाया... उनके अथक परिश्रम और उत्साह के कारण कुछ वर्षों में ही वह स्कूल सुप्रसिद्ध हो गया.. और वहाँ दूर-दूर से बच्चे आने लगे..
केवल 20 वषों में ही स्कूल के पास 2300 एकड़ की भूमि हो गयी और वहाँ 700 एकड़ में खेती की जाती थी.. छात्र ही खेतों में कार्य करते थे.. भवनों का निर्माण भी उन्होंने स्वयं किया... सामान्य शिक्षा के साथ ही बच्चों को कृषि तथा उद्योगों का प्रशिक्षण भी दिया जाता था.. वहाँ धार्मिक शिक्षा का भी प्रावधान था.. इस दलित नेता ने अपने स्कूल के उदहारण द्वारा यह दर्शाया कि शिक्षा का उद्देश्य छात्रों को नौकरी की खोज में दफ्तरों की ख़ाक छानने वाला भिखारी बनाना नहीं है... उन्होंने उन लोगों को उद्यम, स्वाधीनता, उत्साह, तथा परिश्रम की नींव पर अपना जीवन गढ़ने की प्रेरणा दी...

उनका कहना था- 
“जो हमारे दैनंदिन जीवन से किसी-न-किसी  रूप में जुड़ी न हो, वह शिक्षा नहीं है...”

शिक्षा ऎसी कोई चीज नहीं है, जो हमें शारीरिक श्रम से बचाती हो.. यह शारीरिक श्रम को सम्मान दिलाती है.. अप्रत्यक्ष रूप से शिक्षा एक ऐसा साधन है, जो सामान्य लोगों का उत्थान करके उन्हें स्वाभिमान तथा सम्मान दिलाती है...”

‘मैंने ऐसा नियम बना लिया है कि मैं अपने कार्य को अपने ऊपर प्रभुत्व नहीं ज़माने देता.. मैं हमेशा उससे आगे रहता हूँ और उसे नियंत्रण में करके अपने अधीन रखता हूँ... कार्य के सभी अंगों पर पूर्ण प्रभुत्व-बोध से एक तरह का दैहिक-मानसिक तथा आध्यात्मिक आनंद मिलता है, जो काफी संतोषजनक व प्रेरणादायी है... मेरा अनुभव बताता है कि यदि कोई इस योजना के अनुसार चलना सीख ले तो उसे कार्य के द्वारा एक ऐसी शारीरिक ताजगी तथा मानसिक ऊर्जा प्राप्त होगी जो उसे स्वस्थ तथा सबल बनाये रखने में सहायक होती है... मेरा विश्वास है कि जब कोई इतना उन्नत हो जाता है कि वह आने कार्य से प्रेम करने लगे तो इससे अति मूल्यवान ऊर्जा की प्राप्ति होती है...’

‘मेरा विश्वास है कि यदि कोई मनुष्य प्रतिदिन सर्वश्रेष्ठ कार्य करने का संकल्प कर ले, मतलब प्रतिदिन शुद्ध निःस्वार्थ भाव से आजीविका हेतु कर्म करने की चेष्टा करे, तो उसका जीवन निरंतर आशातीत उत्साह से परिपूर्ण हो जायेगा...’

‘मैंने ख्याति की कभी लालसा नहीं की.. मैंने ख्याति को सदैव भलाई का साधन माना.. मित्रों से मैं प्रायः कहता हूँ कि यदि मेरी ख्याति भलाई करने का साधन बने, तो मुझे संतोष होगा... मैं इसे धन के समान सत्कार्य में लगाना चाहता हूँ...’

'दासता के जाल में फँसे किसी भी दुर्भाग्य से पीड़ित राष्ट्र या समुदाय के लिए मेरे ह्रदय में पीड़ा होती है.. मेरी जाति को गुलाम बनाने वाले गोरे लोगों से मुझे जरा भी घृणा नहीं है.. रंगभेद के भाव से ग्रस्त अभागे व्यक्ति पर मुझे दया आती है...’

‘अनेक स्थानों पर लोगों से मिलकर मैंने देखा है कि दूसरों के हितार्थ सर्वाधिक कर्म करने वाले ही सबसे अधिक सुखी हैं और सबसे कम करने वाले ही सर्वाधिक दुखी हैं... मैंने सीखा है कि निर्बल को दी गयी सहायता, देने वाले को सबल बनाती है और दीनों को सताने वाले दुर्बल हो जाते हैं...
“यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन का प्रत्येक दिन अत्यंत उपयोगी रूप से बिताने का निर्णय ले अर्थात वह इस प्रकार कर्म करने का प्रयास करे कि इससे उसकी पवित्रता, निःस्वार्थता तथा उपयोगिता में अधिक-से-अधिक वृध्द हों तो उसका जीवन सदा उत्साह तथा प्रेरणा से परिपूर्ण रहेगा... चाहे वह श्वेत हो या फिर काला.. मुझे उस व्यक्ति पर दया आती है, जिसने दूसरे लोगों के जीवन को उपयोगी तथा सुखी बनाने से उत्पन्न होने वाले संतोष तथा आनंद का अनुभव नहीं किया”



दोस्तों ये थे अंतर्दृष्टि से परिपूर्ण तथा प्रेरणा आलोक से जाज्वल्यमान शब्द, जो वाशिंगटन के प्रत्यक्ष अनुभव से प्राप्त हुए थे....
                                                               धन्यवाद!

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